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Showing posts from March, 2019

ध्यान की प्रक्रिया और गुरु की पूजा - method of meditation and devotion towards guru

ध्येय - वह जिसका हम ध्यान करते हैं।
ध्याता वह है, जो हर समय ध्येय को धारण करता चले यानि हम लोग  । खाते-खाते, पीते-पीते, हंसते-हंसते, रोते-रोते हर समय, जो ध्येय को धारण किये रहे। यह तो नशा है। अगर नशा हो गया, तो बस फिर। उसे लोग कहते हैं कि पागल है। हां, तो वह कहेगा कि मैं पागल हूँ। पागल, पा गया और गल गया। तो जब ऐसा हो गया, तो वह जहां  जायेगा, वहां उसे वही दिखाई पडे़गा। यही ध्यान है। अब तुम जब ध्यान करने बैठते हो, तो मन इधर-उधर भागता है। अनेक तरह की बातें आती हैं। जो सही ध्यान करने वाले साधक हैं, उनके सामने भी यह बातें आती हैं। इसका कुछ कारण होता है। असल में तुम्हारे रूप को लेकर, किसी की ओर से, कोई विचार वातावरण में आ गया, अथवा तुम्हारे अपने ही पूर्व में किये हुए संकल्प, आकाश में मौजूद रहते हैं, जो ध्यान के समय तुम्हारी फ्रिक्वेन्शी (तरंगगति) में आ जायेंगे। इससे दिक्कत आ सकती है। दूसरे अगर तुम्हारा सुरा-संगम
 अर्थात साँसों में मंत्र अथवा भजन ढला नही है तो भी  सही नहीं है, तो भी ठीक ध्यान नहीं जमता। हमारा लक्ष्य सही नहीं होगा, तो इसे ध्यान नहीं माना जायेगा। यह जो साँस चलती है, यह ऐसे नहीं…

मन और भक्ति

साधक का मुख्य काम है कि अपने मन को संसारी विषयों में न जाने दे। इसका उपाय है कि मन को अपने इष्ट के ध्यान में लगावे, खूब अभ्यास करे। रोज सुबह शाम बैठे, और अधिक से अधिक समय  इसमे लगावे। यही साधना है, यही योग है, यही भजन-ध्यान है। इसलिए खूब बैठा करो। हाँ, सीधे बैठने में अगर तकलीफ होती है, तो सुखासन से कर सकते हैं। उसमें भी नहीं बैठ सकते तो खड़े-खडे़ हो सकता है। इसमें भी दिक्कत आती है तो पड़े में भी ध्यान हो सकता है। करो, चाहे जैसे करो। मन को रोकने से काम है। शरीर से मतलब नहीं। खास बात है मन को रोकना। खाने में रुके, उपवास में रुके, बैठने से रुके, उसे रोकना है। उसे रोको। और अगर तुम्हारा मन नहीं रुकता तो उसे साधना नहीं कहते, लक्ष्य है मन को रोकना। अगर तुम्हारा मन खड़ा हो जाता है तो तुम साधना कर सकते हो, प्रगति कर सकते हो, लक्ष्य को पा सकते हो। नियंत्रित मन मित्र है, अनियंत्रित मन ही शत्रु है। मन ही बंधन और मुक्ति का हेतु है। जितना ज़्यादा मन रुकेगा, उतनी ज़्यादा क्षमता आयेगी। और अगर मन नहीं रुकता, तो समझ लो कि ज़्यादा और ज़्यादा मेहनत की ज़रूरत है। मन जितना चंचल होगा, उतना ही ज़्यादा क्षमता रुकने प…