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कौन है आपके इष्ट ?


तो  सबसे पहले अपना एक इष्ट निश्चित कर लेना चाहिए-

हर आदमी का अपना एक इष्ट होता है-होना चाहिए। इष्ट उसे कहते हैं कि जो नाना प्रकार
के अनिष्टों को, दिक्कतों को, हर प्रकार के हमारे कष्टों को आपत्तियों को नष्ट करने में सर्मथ होता है। उसको इष्ट कहते हैं। वह तुम्हारा पूज्य होगा, तुम्हारा देवता होगा और उसके प्रति तुम्हारी अधिकतम श्रद्धा होनी चाहिए। यह अब आप निश्चित कर सकते हैं कि आप की श्रद्धा सबसे अधिक किसमें है उनमें राम, शिव, हनुमान, देवी, देवता, माता, पिता अथवा गुरु कोई भी हो सकते हैं या फिर स्वयं में  । यह आपको खुद निश्चित करना पडे़गा। जिसमें सबसे ज्यादा श्रद्धा और प्रेम हो, जिसे आप सबसे ज्यादा मानते हों वही आपका इष्ट है।
तो जो नन्हा सा प्रेमी साधक है उसका सबसे पहला कर्तव्य है कि वो अपना इष्ट निश्चित करे, और अपनी उस नन्ही सी श्रद्धा को इधर-उधर के अन्य देवी देवता ,  अंधविश्वास और अधूरी मान्यताओं में समर्पित न करे। आप जितना भी श्रद्धा रूपी,प्रेम रूपी अपना भक्तिभाव ईश्वर को दान करना चाहते हैं,वह अपने इष्ट को दान करिये।

ढूंढें इष्ट का एक अथवा ढाई अक्षर का एक नाम(आपका इष्ट मंत्र )

इष्ट निश्चित करने के बाद आप उनका दो ढाई अक्षर का कोई नाम ढूंढ ले , जिसे आप आराम से जप सके | वह होगा आपका इष्ट मंत्र , जो आपकी साँसों में ढल सके |
कई बार ऐसा भी होता है की हम यह समझ ही नहीं पाते कि कैसे decide करना है इष्ट | क्योकि माँ दुर्गा को , पिता राम को , दादी शिव को ,पूजते है | आपकी खुद की श्रद्धा आपकी आवश्यकतानुसार गणपति , हनुमान जी , नरसिंह में भटकती रहती है | ऐसे में मंत्र के द्वारा भी आप जान सकते है आपके इष्ट कौन है ?
देखिये यंहा ये बात अच्छे से समझ लें के ये देवी देवता हमेशा से नहीं थे और हर जगह इन्ही देवी देवता की पूजा होती हो ऐसा भी नहीं है फिर भी अलग अलग धर्मो के  व्यक्तियों  को ईश्वर तत्त्व मिला है | अगर अमेरिका में जगन्नाथ जी पूजे नही जाते तो इसका मतलब ये नही है की वंहा आध्यात्मिकता बिलकुल नही है | अलग अलग धर्म सम्प्रदाय की बात करें तो मुस्लिम धर्म में भी कई उच्चत्तर संत अथवा फ़कीर हुए है जिन्होंने ईश्वर तत्त्व की प्राप्ति करी है | यंहा तक की पहले इतने देवी देवता थे ही नहीं पहले हम वैदिक कल में पूजा करते थे सूर्य की ,नदी की हवा की पानी की | और ईश्वर तत्त्व पहले भी लोगो को मिला है | यंहा इष्ट के माध्यम से हम वह  श्रद्धा  जागृत करना चाहते है जो उस परम सत्ता को आपमें जागृत कर दे ,वह परम सत्ता ,वह  मूल स्त्रोत  जिसे हम ईश्वरत्व कहते है |जो एक है यंहा भी और दूर देश में भी ,दूसरे धर्म में भी | वह ईश्वर जो एक है |


NOTE- यदि आपको इष्ट ढूढने में कोई दिक्कत आ रही हो तो आप राम अथवा ॐ का जप करें , यह सर्वश्रेष्ठ रहेगा |

एकै साधे सब सधै,सब साधे सब जाय।
  तो जब आप अपना इष्ट निश्चित कर लेंगे और जब दिनभर के काम से निवृत्त होकर शाम को घर आते हैं तो समय निकालकर बैठिए और अपने इष्ट को अपने हृदय में बैठाइये दूसरा और कोई स्थान इष्ट का नहीं है। अगर आप बाहर देखेंगे तो आपके अन्दर बीमारी घुस जायगी। आप उसको टाल नहीं सकते आदमी के पास सबसे महत्वपूर्ण हृदय है
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 तो बैठ जाइये शान्ति से, और अपने इष्ट को हृदय में देखिए-बार बार देखिए। चित्र बनवा लीजिये और देखिये। देखते-देखते उसकी आकृति जितनी है, अपने अन्तःकरण में अपने ब्रेन (मस्तिष्क) में खीच लीजिये। जब भी आपके ऊपर आपत्ति आती है, दिक्कत आती है, परेशानी आती है तो उनके स्वरूप को स्मरण करो। वह स्वरूप चित्त में खड़ा हो जाना चाहिए। ऐसा जो इष्ट है वह आपकी हमेशा मदद करेगा। तो बैठना चाहिए रोज नियम से। चाहे चारपाई पर ही बैठिए, चाहे नीचे जमीन पर आसन बिछाकर बैठिए-जैसी जिसकी रुचि हो। यह साधक के ऊपर है। शान्ति से आंख बन्द करके बैठ जाइये और हृदय में इष्ट को बैठाइए। पहले आसन लगाइये हृदय में इष्ट के लिए और उन्हें उस पर बैठाइए। फिर नख से शिख तक पूरा देखिए। उनके स्वरूप को सांगोपांग हृदय में देखिए। अगर राम को लेते हैं तो देखिए-नीला वर्ण है, मुकुट पहने हुए हैं, धनुष कन्धे में दिखाई पड़ता है, पीताम्बर पहने हैं-ऐसे देखते चले जाओ। अगर देवी की उपासना करते हो तो देवी का रूप हृदय में देखिए। अगर गुरु को लेते हो तो गुरु जैसे हां वैसा ही चित्र मन में खड़ा करो। उन्हें हृदय में बैठाकर ठीक से देखते रहो। प्रणाम कर लो और प्रार्थना करो-हे भगवन ! मेरे इस शरीर को रथ बना लो, इन्द्रियों को घोडे़, मन को लगाम और बुद्धि को सारथी बना लो। आप इसमे आत्मारूप से रथी होकर बैठ जाओ। मरे मन में जो अनुराग है उसे अर्जुन बनाओ और चारो तरफ जो करम दल है यह कौरवों का, इसे नष्ट करने में आप समर्थ होइए। ऐसी प्रार्थना करके फिर प्रणाम कर लो। अपनी हाजिरी दे लो। हाजिर आदमी कभी नही मारा जाता। गैरहाजिर आदमी को सजा मिलती है, और सदा के लिए रिजेक्ट (खारिज) हो जाता है। इस प्रकार अपने इष्ट के यहाँ रोज सुबह-शाम नियमित हाजिरी दो। हाँ इसमे दिक्कतें आ सकती हैं। कभी विघ्न आ सकते हैं, दूसरे प्रकार के संकल्प आ सकते हैं। तो इसे आप अपनी परीक्षा मानिए। इससे घबराना नहीं है। अपने नियम से हटना नहीं है। इसे छोड़ नहीं देना है निरंतर इसमें लगे रहिए। लगातर करने से आपको आदत बन जाएगी-हैविट हो जाएगी तो फिर इष्टदेव आपके हृदय में विराजमान हो जाएंगे। इससे आपको बड़ा लाभ मिल जायगा।

कैसे जाने आपका इष्ट मंत्र - यंहा क्लिक करें 


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