मन और भक्ति


साधक का मुख्य काम है कि अपने मन को संसारी विषयों में न जाने दे। इसका उपाय है कि मन को अपने इष्ट के ध्यान में लगावे, खूब अभ्यास करे। रोज सुबह शाम बैठे, और अधिक से अधिक समय  इसमे लगावे। यही साधना है, यही योग है, यही भजन-ध्यान है। इसलिए खूब बैठा करो। हाँ, सीधे बैठने में अगर तकलीफ होती है, तो सुखासन से कर सकते हैं। उसमें भी नहीं बैठ सकते तो खड़े-खडे़ हो सकता है। इसमें भी दिक्कत आती है तो पड़े में भी ध्यान हो सकता है। करो, चाहे जैसे करो। मन को रोकने से काम है। शरीर से मतलब नहीं। खास बात है मन को रोकना। खाने में रुके, उपवास में रुके, बैठने से रुके, उसे रोकना है। उसे रोको। और अगर तुम्हारा मन नहीं रुकता तो उसे साधना नहीं कहते, लक्ष्य है मन को रोकना। अगर तुम्हारा मन खड़ा हो जाता है तो तुम साधना कर सकते हो, प्रगति कर सकते हो, लक्ष्य को पा सकते हो। नियंत्रित मन मित्र है, अनियंत्रित मन ही शत्रु है। मन ही बंधन और मुक्ति का हेतु है। जितना ज़्यादा मन रुकेगा, उतनी ज़्यादा क्षमता आयेगी। और अगर मन नहीं रुकता, तो समझ लो कि ज़्यादा और ज़्यादा मेहनत की ज़रूरत है। मन जितना चंचल होगा, उतना ही ज़्यादा क्षमता रुकने पर पैदा करेगा। यह निश्चित है। मन अगर चंचल नहीं होता, तो रुकने पर क्षमता नहीं पैदा करता। इसलिए साधक को मन की चंचलता से उद्विग्न होने के बजाय, उसे रोकने का प्रयत्न करना चाहिए। मन को लगाना है, एक जगह। यह कैसे एक विन्दु पर खड़ा हो जाय। यही भजन है। भज न, यह मन  भागे न। बस एक जगह रहे। अपने इष्ट से इस मन की विभक्ति या अलगाव न हो, यही भक्ति है। 

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