ध्यान की प्रक्रिया और गुरु की पूजा - method of meditation and devotion towards guru

ध्येय - वह जिसका हम ध्यान करते हैं।
  ध्याता वह है, जो हर समय ध्येय को धारण करता चले यानि हम लोग  । खाते-खाते, पीते-पीते, हंसते-हंसते, रोते-रोते हर समय, जो ध्येय को धारण किये रहे। यह तो नशा है। अगर नशा हो गया, तो बस फिर। उसे लोग कहते हैं कि पागल है। हां, तो वह कहेगा कि मैं पागल हूँ। पागल, पा गया और गल गया। तो जब ऐसा हो गया, तो वह जहां  जायेगा, वहां उसे वही दिखाई पडे़गा। यही ध्यान है। अब तुम जब ध्यान करने बैठते हो, तो मन इधर-उधर भागता है। अनेक तरह की बातें आती हैं। जो सही ध्यान करने वाले साधक हैं, उनके सामने भी यह बातें आती हैं। इसका कुछ कारण होता है। असल में तुम्हारे रूप को लेकर, किसी की ओर से, कोई विचार वातावरण में आ गया, अथवा तुम्हारे अपने ही पूर्व में किये हुए संकल्प, आकाश में मौजूद रहते हैं, जो ध्यान के समय तुम्हारी फ्रिक्वेन्शी (तरंगगति) में आ जायेंगे। इससे दिक्कत आ सकती है। दूसरे अगर तुम्हारा सुरा-संगम
 अर्थात साँसों में मंत्र अथवा भजन ढला नही है तो भी  सही नहीं है, तो भी ठीक ध्यान नहीं जमता। हमारा लक्ष्य सही नहीं होगा, तो इसे ध्यान नहीं माना जायेगा। यह जो साँस चलती है, यह ऐसे नहीं है, कि यहां से ऐसे गयी और ऐसे आयी। नाक के बायें स्वर को चन्द्र-नाड़ी, और दाहिने को सूर्य-नाड़ी कहते हैं। जब दोनों समगति से चलती हैं, तो सुषुम्ना होतीहै। यह ध्यान में सहयोगी है। दिन में ध्यान के समय चन्द्र नाड़ी बाँया स्वर, और रात्रि में ध्यान के समय सूर्य-नाड़ी दाँया स्वर, चलना चाहिये। तब ध्यान में बाधा नहीं आयेगी। इसलिए ध्यान में बैठने के पहले, श्वास ठीक कर लेना चाहिये। इसके अलावा पेट अधिक भरा हो, खाना ज़्यादा खा लिया है, तो ध्यान नहीं लगेगा। आसन ठीक नहीं है, तो भी बाधा आयेगी। ऐसे ही शरीर की या बाहरी अनेक दिक्कतें आती हैं। इन सबको ठीक करके ध्यान में बैठना चाहिये। अब गुरु के ध्यान के सहारे, हमें सुई के छेद से होकर निकलना है। कहते हैं -
धड़ धरती का एकै लेखा, जो बाहर सो भीतर देखा।
तो गुरु को हृदय में बैठाना होगा, हृदय में आसन तो है नहीं। मानसिक आसन बिछाना होगा, गुरु को बैठाना होगा, उनके पास खुद को भी बैठना होगा। उनको प्रणाम करो, दर्शन करो। उनका सिर कैसा है, माथा कैसा है? ऐसी आँखे हैं, ऐसे कान हैं, ऐसे वक्षस्थल, ऐसा पेट है। ऐसा वेश है, इस तरह से बैठे हैं। ऐसे हाथ हैं, ऐसे पैर हैं, ऐसे पैर का अंगूठा है, ऐसे नख हैं। अंगूठे को धो लिया, धोकर जल पी लिया। फिर पूजन करो, स्तुति करो-बस यही ध्यान है। जितना समय इसमें लग जायेगा, वह पुण्यकाल है। इसके विपरीत बाहर के विषयों में जो समय गया, वह पाप काल है। एक मिनट का पुण्य काल, एक करोड़ मिनट के पाप काल का शमन कर देता है। तो इस तरह से ध्यान करते-करते, आगे का रास्ता मिल जाता है। और
यह जो बाहर-बाहर की पूजाअर्चा है यह अलग है। देखो, एक भगत रहे, भगवान के प्रेमी भावुक। भगवान की मूर्ति पूजते थे। फिर एक बड़ा मन्दिर बनवाया। उसमें भगवान की मूर्ति पधराई। यज्ञ भण्डारा किया। तमाम लोग आने-जाने लगे। तो भगत अब पुजारी बन गये। मन्दिर खूब चला। लेकिन कुछ दिन बाद, मन्दिर-मूर्ति का आकर्षण कम हुआ। लोग कम आने लगे। पहले जैसे चढ़ावा न आने लगा। वहीं पास में एक फक्कड़ महापुरुष रहते थे। अपने में मस्त। कोई आता-जाता, तो उनको गाली-गलौज करके भगा देते। उनकी ख्याति सुन कर ज़्यादा लोग  आने लगे। भीड़ टूट पड़ी। महात्मा गाली-गलौज करते, तो भी भीड़-भाड़ बढ़ती जाती थी। यह देख कर मन्दिर के पुजारी ने अपने भगवान के सामने कहा- हे भगवान! मेरे ही आँखों के सामने, मंदिर में सवा मन का भोग लगता था। छप्पन-भोग लगता था। अब सवा सेर भी मुश्किल है। उधर वह बाबा, लोगों को गाली देता है, तब भी लोग घेरे रहते हैं। तो फिर क्या हुआ, कि एक दिन एक दिगम्बर महात्मा के वेष में भगवान मन्दिर में आये। बोले पुजारी जी दण्डवत, दण्डवत पुजारी महाराज! पुजारी ने भी कहा, दण्डवत बाबा। कहो किधर से आये? वो बोले, हमारी यहां पास में सन्तों की जमात पड़ी है। रात को एक बड़ा अचम्भा हुआ, कि सुई की नोक के बराबर छेद से, अस्सी हजार ऊंट निकल गये। पता नहीं कहां चले गये। हम सारे महात्मा, उन्हीं ऊंटों को ढूंढ रहे हैं। पुजारी ने सुना। बोला, हट कहीं का झूठा बाबा। अरे! कहीं सुई की नोक बराबर छेद से अस्सी हजार ऊंट निकल सकते हैं? साधु होकर झूठ बोलते हो। बाबा घूम कर उस फक्कड महात्मा के पास गये और यही बात कही। तो वह अपनी मस्ती में मस्त महापुरुष, अपने नशे से कुछ उतरे। यह नशा होता है। जिसे यह नशा छा जाता है, वह फिर उसी में मस्त रहता है। तो वह बाबा, उसकी बात सुनकर जोर से हंसे और बोले, अरे कौन सी ऐसी अचम्भे की बात हैभाई। यह जो सुई की नोक बराबर छेद से निकल गये ऊंट। भगवान की मर्जी से तो, बिना छेद के ही निकल सकते थे। उसकी शक्ति से क्या काम नहीं हो सकता? तब वह नागा, भगवान विष्णु के रूप में प्रकट होकर पुजारी से बोले। देखो, तुम जीवन भर मर गये पूजा करते-करते, लेकिन तुम्हारे अन्दर यह विश्वास नहीं आ पाया, कि भगवान ऐसा भी कर सकते हैं। इस महात्मा को देखो, सबको गाली देता रहता है, न पूजा करता है न कुछ करता है, फिर भी उसका विश्वास ही फलीभूत हो रहा है।
विश्वासं फल दायकमं्
तो इस तरह से विश्वास आ जाये, तो ठीक हो जाता है। भृंगी कीड़े की तरह। भृंगी कहीं से कीड़े को पकड़ ले आता है, और मिट्टी का घर बनाकर, उसमें रख लेता है। फिर उसे भिन-भिन आवाज करके भृगी बना देता है। अपने रूप में ढाल देता है। तो मन, एक कीड़े की तरह है। इसमें हम जो कुछ भी भर देंगे, वह वैसा ही रूप ले लेता है। इसी के लिए यह सब ध्यान, भजन, साधन, सब बनाया गया है। यह झूठा संसार है। झूठ को झूठ से मारा जाता है। जैसे कहीं कोई झूठ-मूठ भूत खड़ा हो जाता है, तो वह झूठे मंत्रों-जंत्रों से जाता है। झूठ को झूठ से मारा जाता है। ‘टिट फार टैट’,जैसे को तैसा। तो इस प्रकार से विश्वास पैदा करना है। अपने अन्दर एक चार्ट बनाना पड़ेगा। जबरदस्ती, विश्वास के आधार पर, यहीं हृदय में। सब बह्मा, विष्णु, शंकर आदि के रूप। रावण का रूप दस सिर का। दस इन्द्रियां ही उसके दस सिर हैं। ऐसे ही एक सम्पूर्ण चार्ट अन्दर तैयार हो जाता है। यही सब करना है।  इंगला, पिंगला, ताना भरनी, सुषमन तार से बीनी चदरिया।  झींनी-झींनी बीनी चदरिया। बीनत-बीनत मास दस लागै।।
तो इस प्रकार से यह चदरी बीननी पड़ती है, इसमें कुछ समय लगता है।
बीनते-बीनते बन जाती है। इसका अर्थ अच्छी तरह समझ लो-
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति; पूजा मूलं गुरोर्पदम्
मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यम्, मोक्षमूलं गुरोर्कृपा।।
तो पहले गुरु के सामने समर्पण करके, अपनी मन की शंकाओं का निराकरण कर लें। और जब मन साफ हो जाये, तो ध्यान करें। जब हम ध्यान में बैठें, तो प्रसन्नता होनी चाहिये। किसी बड़े आदमी से मिलते हो, तो थोड़ा मुस्कराते हो। चाहे बनावटी ही हो। इसी प्रकार जब ध्यान में जाय, तो प्रसन्नता होनी चाहिये। चाहे बनावटी  हो। सचमुच में हो, यह अच्छी बात है। और यदि कोई ऐसा प्रसंग आ गया, कि उसकी मन में चिन्ता करनी पड़ रही है, तो ध्यान में बैठना ठीक नहीं। क्योंकि मन को वह चिन्ता पकड़े रहेगी।ं मन तो एक ही है, चाहे उसे ध्यान में लगाओ, चाहे चिन्ता में लगाओ। कुर्सी तो एक ही है, चाहे उसमें भगवान को बैठा दो या चिन्ता को। इस तरीके से पहले मन को ठीक कर लो। मन में खुशी, खूब खुशी होनी चाहिये। सौभाग्य मानना चाहिये, कि मुझे भगवान के समीप होने का, ध्यान-भजन का, यह क्षण मिल रहा है। प्रसन्नता मन में रहेगी, तो ध्यान के सहयोगी भाव जाग्रत होते हैं। बाधक भाव दबे रहते हैं। चिन्ता आदि निष्प्रभावी रहते हैं। ध्यान में मन ठीक से लगता है। सेवा करनी पडे़गी। तुम्हारेपास बहुत से साधन हैं। सब कुछ करना पड़ेगा। भजन तो एक सम्पूर्ण प्रक्रिया है। भगवान कोई आदमी नहीं है, कि बुला लिया और आ जायेगा। तुम ने जो जनम-जनम से बेइमानी की है, हाथ ने की है, आँख ने की, जीभ ने की है। मन ने की है। तो इन सबका जो कर्जा है, उसे चुकाना पडे़गा। इसी के लिए सेवा करे, जप करे, ध्यान करे। और जब कर्जा चुकता हो जायेगा, तो भगवान तो तुम्हारे हृदय में बैठा है। यह सब करते-करते आगे गुरु बताने लगते हैं, कि अब ऐसा करो, यह करो, यह करो। तो फिर उसकी प्रगति होती जायेगी। नाम, रूप, लीला, धाम,सब मिलते जायेंगे। सेवा, भजन के द्वारा पुण्य का धन बढ़ाना है। जो जनम-जनम का कर्जा है, पाप रूपी कर्जा माया का, उसे पटाने के लिए, पुण्य इकट्ठा करके, कर्जा से छूट जाना है। जहां कर्जा चुकता हुआ, तो माया के यहां से छुट्टी हो जायेगी। वह कह देगी, कि भगवान! तुम्हारे फलां आदमी का कर्जा चुकता हो गया। बस फिर भगवान के पास होने का रास्ता खुल गया। जप, ध्यान, भजन, सेवा, योग, साधना, यह सब इसी के लिए है। यम, नियम, त्याग, मौन, देश, काल, आसन, मूलबंध, देह की समता, नेत्रों की स्थिति, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि ये सब बहुत से अंग हैं। यह सब सब्जेक्ट हैं। जैसे पढ़ाई के लिए जब शुरू में स्कूल जाता है लड़का, तो उसे सब सब्जेक्ट पढ़ने पढ़ते हैं। 10वीं 11वीं में फिर चार-छः सब्जेक्ट रह जाते हैं। एम.ए. में पहुंचते-पहुंचते एक विषय रह जाता है। केवल एक से भी हो सकता है। केवल जप करने से भी काम हो सकता है। लेकिन 24 घण्टे जप में मन न लगेगा, तो फिर बेइमानी करेगा। इसलिए जब जप में न लगे, तो सेवा में लगा दो। तो इस तरह से धीरे-धीरे कर्जा चुकता जायेगा और हम भगवान के क्षेत्र में आ जायेंगे। इस तरह से
धीरे-धीरे क्षमता आ जायेगी। महापुरुष के पास एक ऐसी इनर्जी होती है, ऐसी कला होती है कि वह इन दो के झगड़े से निकल जाता है। यह जो सजातीय और विजातीय है सुख और दुख, दिन और रात यह जो द्वन्द्व है सर्कुलेशन, जिससे यह संसार चलता है, इसकी वह एडजस्टिंग कर ले जाते हैं। इससे वो परे हो जाते हैं। इसका मूल कारण यह है, कि
एक तो अच्छा है, एक बुरा है। इसी से दुनिया चलती है। एक हमें अच्छा लगता है, एक बुरा लगता है। तो जिसने अच्छा लगने वाले का त्याग कर दिया है, वह बड़ी अच्छी गति को प्राप्त होता है। महापुरुष में सबसे महत्वपूर्ण बात है, कि वह त्याग का त्याग करता है। त्याग के त्याग का मतलब होता है, कि जब बराई का त्याग करके अच्छाई को प्राप्त किया तो अब जो हमने अच्छाई प्राप्त की है, उसका भी त्याग कर दें, और समत्व को ले लें। यह है त्याग का त्याग। यह संत महापुरुष ही कर पाते हैं। इसलिए उनकी क्षमता अलग है।  तो यह जो अन्तःकरण है, यह अंतःकरण एक ऐसी जगह है कि जब हम इसमें गुरु को देखते हैं, तो जो गुरु का गुरुत्व है, वह इसमें रह जायेगा। हमारा अन्तःकरण एक ऐसी चीज़ (उपकरण) का नाम बोला जाता है, कि जो उस जगह पर पहुँचता है-उसको वह कैच कर लेता है। जो वहां पहुँचता है उसको वह रख लेता है। तो ध्यान का मतलब यह है, कि उसके (इष्ट के) अन्दर जो इनर्जी है, ताकत है, जो शक्ति है, उसे हम रख लेते हैं। वह इनर्जी हमें प्राप्त करना है, इसलिए हम उसका ध्यान करते हैं। बस वही काम करेगी। अगर प्रेजेन्ट में हम गुरु को पकड़े हुए हैं, तो प्रश्न ही नहीं उठता कि काम आ जाय, क्रोध आ जाय, लोभ आ जाय, मोह आ जाय। उसके रहते नहीं आएंगे। इसीलिए गुरु का ध्यानसबसे ऊँचा माना गया है। गुरु की जगह हम स्वयं अपना वीटो-विल पावर आजमायेंगे, तब धोखा खाएंगे। और गुरु को जिसने बैठा लिया, तो विजय ही विजय है। तो फिर गुरु आने नहीं देगा किसी बाधा को। यह प्रश्न ही नहीं उठेगा। और हल हो जायेगा। क्योंकि जब गुरु को देखेगा साधक, तो मन जायेगा नहीं-और जब नहीं देखेगा, तब जायेगा। जाएगा, तो सोचेगा आज हमारी कितनी प्रगति हुई, आज हमारा मुनाफा कितना हुआ जो हमने भजनरूपी विजनेस (व्यवसाय) किया। देखा कि आज चौगुनी प्रगति हुई। तो झट उसके साथ खुशी आएगी, और खुशी की बगल से ईगो (अहंकार) भी चला जायगा। और ईगो घुस जायगा तो टंगड़ी ऊपर हो जायेगी, मूड़ी नीचे हो जायगी। यह है साधक का रोना-झगड़ना। इसलिए गुरु को हृदय में लिए रहना ही ठीक है। गरु भगवान के चरणों का ध्यान करते हैं। क्योंकि उसमें ज़्यादा क्षमता है। मस्तक के बजाय चरणों में। अब जैसे कहते हैं, गुरु महाराज के चरणों में प्रणाम। गुरु महाराज के दासों के चरणों में प्रणाम। भगवान के दासानुदासों के चरणों में प्रणाम। तो इसका मतलब और अधिक क्षमता की बात है। जितनी दीनता का भाव बढ़ेगा, उतनी ज़्यादा क्षमता बनती जायेगी। तो गुरु के चरणों में प्रणाम, यह साधारण है। और दासानुदासों के चरणों में प्रणाम, यह असाधारण है। इसमें ज़्यादा क्षमता बनती है। अपनी दीनता और भगवान की महत्ता, जिसमें ज़्यादा से ज़्यादा बने। अधिक से अधिक आदर सूचक जो हो, उसमे क्षमता अधिक होगी। इसलिए चरणों का महत्व विशेष होता है।

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