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प्रकृति की शक्तियां और हम

  •  जब कोई समस्या हमारे सामने खड़ी होती है |  कुछ उससे  तत्काल हार मान सकते हैं और  कुछ उसके समाधान को खोजने में लग जाते हैं | कुछ उसे एक अवसर की तरह लेते हैं और कुछ उसे भगवान भरोसे छोड़ देते हैं | याद रखिए हर समस्या भगवान भरोसे छोड़ने लायक नहीं है | क्योंकि अगर आप आज इन समस्याओं को भगवान भरोसे छोड़ेंगे तो आपको कल भी इसी समस्या से दो चार होना पड़ेगा यहां तक कि अगले जन्म में भी इसी समस्या से दो चार होना पड़ सकता है यह समस्या आपकी उन्नति के लिए या आपकी क्षमता को बढ़ाने के लिए ही आपके सामने दी जा रही है और अपनी उन्नति और अपनी क्षमता को बढ़ाना हर आत्मा का उद्देश्य होता है |

जैसा की हम पहले ही देख चुके हैं कि हमारे पीछे पूरी दैवीय आर्मी रहती है तो अब सोच लीजिए कि समस्या वाकई में क्या बड़ी होती है वास्तव में समस्या के प्रति हमारा नजरिया ही समस्या को बड़ा या छोटा बनाता है जब हम छोटे रहते हैं और कोई  खिलौना चाहिए होता है तो उस समय हमारे जीवन में सबसे बड़ी समस्या खिलौने को प्राप्त करना ही होता है क्योंकि आयु में हमारे लिए वही समस्या सबसे बड़ी होती है जब हम बड़े होते हैं तो जो समस्या हमारे सामने आती है | हम उसी को बड़ा बना लेते हैं लेकिन अगर आप अपनी समस्या को लेकर किसी बड़े  के पास जाएंगे तो उसके नजरिए से वह समस्या बहुत छोटी होगी |
यहां पर सिर्फ यह बताने की कोशिश की जा रही है कि समस्या या नकारात्मक ऊर्जा जोकि हमारे सामने आती है | हमारी क्षमता के अनुसार और हमें मिलने वाली सहायता के सामने बहुत छोटी होती है लेकिन इस छोटी सी समस्या से हमारी  ऊर्जा आत्मशक्ती  ,हमारी क्षमता ,हमारी उन्नति बहुत आगे बढ़ सकती है |
प्रकृति की शक्ति हमारे जीवन में कुछ इसी तरह से कार्य करती है |
ठीक इसी तरीके से यदि प्रकृति हमारे सामने हमारी उन्नति के लिए कोई समस्या खड़ी करती है तो वह हमारे सामर्थ्य अनुसार इस समस्या को खड़ी करती है यदि आपके सामर्थ में हैं यदि आप सक्षम हैं तभी कोई समस्या आपके सामने आती है यदि आप समझ सक्षम नहीं हैं तो वह समस्या आपके सामने कभी भी नहीं आएगी कोई भी समस्या और उसका साइज़ आपको दो चीजें बताती है
1.   आपका सामर्थ्य कितना है ...
2.   आप आप अपने अंदर क्षमता को कितना बढ़ा सकते हैं....
ईश्वर हमारी  सहायता में प्रथम रूप से प्रकृति की शक्ति द्वारा  करते हैं  | हमारे अंदर जो भी तत्व है  , सभी प्रकृति में बहुत ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं | हमारे अंदर जो भी ऊर्जा है वह कई प्रकार के ऊर्जाओं का   सम्मिलित रूप है | जिससे हमने यह शरीर धारण किया है | वह ऊर्जा भी प्रकृति में बहुत सी मात्रा में पाई जाती है | उदहारण के रूप में  ,  हम सांसे भरते समय ऑक्सीजन को लेते हैं |  हम ऑक्सीजन की बहुत थोड़ी मात्रा ही लेते हैं क्योंकि हम अपने सामर्थ्य के अनुसार उतनी ही मात्रा को ग्रहण कर सकते हैं जबकि हम जानते हैं कि  पृथ्वी मंडल पर  ऑक्सीजन  सबसे अधिक उपलब्ध है | ठीक इसी तरह हम ऊर्जा भी अपने सामर्थ्य के अनुसार ही ग्रहण करते हैं जबकि पूरे ब्रह्मांड में ऊर्जा की मात्रा बहुत ही ज्यादा है|

वह सारी ऊर्जा  जो हमारे शरीर को बनाती  है वह  ब्रह्मांड में अथाह  रूप से उपलब्ध है | योगिक रूप से देखें तो हमारे शरीर का निर्माण पंचमहाभूत करते हैं ---- पृथ्वी ,जल , अग्नि , वायु और आकाश  और यह भी ब्रह्मांड में अत्यधिक रूप में उपलब्ध है यह शक्ति प्रकृति की शक्ति कहलाती है | अर्थात जो शक्ति हमारे अन्दर  समाई हैं , जो शक्ति हमारे जीवन का संचालन कर रही है वह शक्ति प्रकृति की शक्ति है | जब हमारे शरीर में कोई भी विकार या रोग  उत्पन्न होता है या हमारे जीवन में कोई भी समस्या उत्पन्न होती है | जब   हमारे शरीर की शक्ति कमजोर पड़ती है या आत्मा की शक्ति कमजोर पड़ती है उस समय हम प्रकृति से सहायता मांग कर ...मतलब प्रकृति से ऊर्जा को लेकर  अपनी समस्या को  बीमारी की रोग को और अपने विचारों को ठीक कर सकते हैं | पूरा उर्जा विज्ञान इसी सिद्धांत पर कार्य करता है उदाहरण के लिए  रेकी ऊर्जा चिकित्सक जब भी किसी किसी की सहायता करते हैं तो वह वास्तव में ब्रम्हांड से रेकी ऊर्जा (रेकी जो कि एक ब्रम्हांडीय  जीवनी शक्ति  है  | जीवन को चलाने के लिए एक महत्वपूर्ण शक्ति है ) को खींचकर उस व्यक्ति के ऊर्जा मंडल के भीतर डालते हैं वहां जहां इसकी जरूरत है | यहां पर देखिए ऊर्जा चिकित्सक स्वयं को एक माध्यम के रूप में प्रयोग में लाता है | ब्रम्हांडीय ऊर्जा उसके द्वारा व्यक्ति में डाली जाती है | रेकी हीलर अपने सामर्थ्य के अनुसार और व्यक्ति के ऊर्जा सहने की क्षमता के अनुसार ऊर्जा को व्यक्ति के अंदर डालता है साथ में यहां पर प्रकृति खुद इस बात का ध्यान रख रही होती है  व्यक्ति को उतनी ही ऊर्जा प्रवाहित की जाए जितनी ऊर्जा कि उसको आवश्यकता है | इसे एक उदाहरण से समझते हैं यदि रेकी ऊर्जा  को आप समुद्र मान लें और एक व्यक्ति के ऊर्जा सहने की क्षमता  एक छोटा से कॉफ़ी मग जैसी होती है  तब हीलर  का कार्य उस पाइप की तरह होता है जोकि उस समुद्र से पानी लेकर उस मग में भरेगा | गुरुत्वाकर्षण के नियम के अनुसार ऊपर से जो नीचे की तरफ आएगा उसका वेग ज्यादा रहेगा और एक मग का इतना समर्थ नहीं हो सकता कि वह समुद्र की क्षमता को सह सके |   ऐसे में वह कौन है जो यह डिसाइड करती है कि कितनी मात्रा में ऊर्जा को चिकित्सक के माध्यम से व्यक्ति को पहुंचाना है यह प्रकृति है | इसी  तरह जब हम मंत्र जप,  ध्यान,  योग_ प्राणायाम आदि   करते है | खुद ब्रह्माण्ड की ऊर्जा को ग्रहण करने की कोशिश करते हैं | तब  प्रकृति यह निश्चय करती है कि कितनी मात्रा में एक व्यक्ति के अंदर ऊर्जा को प्रवाहित करना है ताकि  उस व्यक्ति की क्षमता ऊर्जा को अच्छे से  संभाल सके | 

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